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General Legal Query India · 30 Jul 2025 · 23 views

किसी मंदिर को प्राचीनतम घोषित करने का अधिकार किस न्यायालय को है?

AN Asked by Anant Abhishek Dwivedi from India

Quick Answer

किसी मंदिर को प्राचीनतम घोषित करने का अधिकार प्रमुख रूप से उच्च न्यायालयों (High Courts) और सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के पास होता है। भारत में मंदिरों और धार्मिक

Detailed Legal Analysis

किसी मंदिर को प्राचीनतम घोषित करने का अधिकार प्रमुख रूप से उच्च न्यायालयों (High Courts) और सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के पास होता है।

भारत में मंदिरों और धार्मिक स्थलों के प्राचीनतम मान्यता देने की प्रक्रिया और अधिकार मुख्यतः निम्नलिखित पहलुओं पर आधारित हैं:

  • संविधान की धारा 25: यह धारा हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने और धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार देती है। इस अधिकार के अंतर्गत मंदिरों की प्राचीनता की पहचान भी की जा सकती है।
  • हिंदू धार्मिक स्थान और अधिनियम 1951: इस अधिनियम के तहत, धार्मिक स्थलों की स्थिति और उनकी प्राचीनता को लेकर विवादों का समाधान उच्च न्यायालय द्वारा किया जा सकता है।
  • उच्च न्यायालय का अधिकार: यदि किसी मंदिर की प्राचीनता के संबंध में विवाद उत्पन्न होता है, तो संबंधित उच्च न्यायालय मामले की सुनवाई कर सकता है और निर्णय दे सकता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार: यदि उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के खिलाफ अपील की जाती है, तो सर्वोच्च न्यायालय अंतिम निर्णय देगा।
  • स्थानीय प्राधिकरण: कुछ मामलों में, स्थानीय प्राधिकरण जैसे कि जिला प्रशासन या अन्य सरकारी निकाय भी मंदिरों की स्थिति की जांच कर सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय न्यायालय के द्वारा ही लिया जाता है।

इसके अतिरिक्त, यदि मंदिर की प्राचीनता का विवाद सांस्कृतिक या ऐतिहासिक दृष्टिकोण से हो, तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India) भी इसमें शामिल हो सकता है, लेकिन अंतिम मान्यता न्यायालय द्वारा ही दी जाएगी।

अतः, मंदिर की प्राचीनता को निर्धारित करने का कार्य उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय पर निर्भर करता है, जो धार्मिक अधिकारों और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण के लिए प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

Last updated: August 3, 2026 LPReviewed by LawPucho Legal Team

Disclaimer: AI-generated for educational purposes only. Does not constitute legal advice. Consult a qualified practitioner.

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